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Showing posts from April, 2023

अक्षय जोरी करत रस अक्षय

अक्षय जोरि करत रस अक्षय। विरहित बदन अनृत तप्त कंचन,संयुक्त युगल मलय सम वक्ष। अंजन विविध आयुध अति तीक्ष्ण,भेदित परस्पर सर्व करि लक्ष्य। कहि आर्शीवचन मुदित मन सहचरी,एक सुखद सुहाग "प्यारी" स्वर रक्ष।

बनै दैन परस्पर

बनै दैन परस्पर सुख हित चंदन। बनू होर हिय अतिही सुख कारण,प्रति पल निमिष  होय उर येई मंथन। बसू हार सिंगार साज सजी सेजा,पेय शीतल गंध सुगंध स्वादु व्यंजन। झकै छुए अंग गहन भीतर निर्बाधित,दोउ लालच उर कर करै अनुरंजन। सखी "प्यारी" पिय रस सार प्रेम येई,ह्र्दय नव नव भाँत रंगे उर रंजन।

श्रीयुगल चरण

श्रीयुगल चरण नुपुर रूनझुन सुनि। रंग सदन ड्यौढी सखि निशिही,करत बयार बीझन खैचि डोरि। आरंभ प्रथम किंकनि कटि बोलति,मोह्य सर् चुनरि छूटन धुनि। अरू नुपुर बजन दूजेई सुनि मौन,फैरी खंडित सुमनि सुगंध चहु दिशी। रंग विलास करत विलसत दोउ,"प्यारी" ना रैन भान‌ कद झीनी।

जानत अंत तुम्ही में पाए

जानत अंत तुमही मे पाय। होय अधीर तऊही मनवा,कौन याए समुझाए। सुमनि होय विलग तरू कितनो,जानि बिटप सोई जाय। दिवस बरस बीतै चहै जैसौ,प्राण अंकही निसाए। "प्यारी" नाथ पिय सचु प्यारी,सोई दिन आस लगाए।

ब्रजरस ब्रजचन्द कोउ न सींवा

ब्रजरस,ब्रजछंद कोउ न सींवा। देश काल जाति बाँधि सकै न,लांघि बाँध जन-जन जि जीवां। नेह प्रेम रस भरै सब आखर,ज्यू बौलै टपकै रस अति जिहा। मति गति प्रेम सौ प्रेम डुबोए,अजी बोलत बोल प्रेम बल लिवा। बिनु जानि सब जानि प्राण देय,मुखर मधुर सहजई उर रीहा। मुख समता कौन कहै ब्रह्मानंद,"प्यारी" बिरह्म वारै ह्यौ तौ तजि कीवां।

दृग खंजन

दृग खंजन अंजंन लगै वाकै। मुख भौरा मुस्कनि रस राँची,नैननि तेज धार सौ बाँकै। अंग टौना रंग श्याम सलौना,बृहत दोउ वपु पै मद-मातै। मौन करै अनगिन कौतुक इन,"प्यारी" होत कहा जोई बतियातै।

डाली डोल कुसुम

डाली डोल कुसुम हित रमण। चुनत बरण आकृत भाँति भिन्न,राजत मधै बाढि हित सबन। मचत होर बढि-बढि सेवन हित,अतिही निकट चहै सब परन। धन धन भाग पुहुप धन उन्ही,औसर परै "प्यारी" जिन तकन।

यत उषाकाल

यत् उषाकाल:प्रात: गमतिपवनौमदंमन्दम्। लुठिंतौपरस्पर: तडितमेघ: महीनऽवरणऽबद्धसह:।।१।। चिन्हित रसौ सर्वत्र: दृश्य नागवल्लीपात्रौचाभूषनम्। त्रौटिगुम्फकुसुम: इतस्तत: किञ्चश्वैतशय्याऽच्छादनंछप:।२।। यद्यपि विथकितपरिदृश्यतै तद्यपि अतीव:ओरिइच्छतम्। प्रतिअंगौसुअंग: आबद्धगह: भुजऽलिगड्णौद्वौवक्षह्रृदय:.।।३ प्राप्यंमुमुक्षि स्वर्गलोकविष्णुचइच्छ:नप्राप्यम्। सह्यतितिक्षौक्क्षुधा: सरल: अपितुऽदृश्यौऽसह्यतन्नौऽहम्।।४ सखिसर्वतत्परायणं सेव्युगल: चरणौऽवलंबहृदयम्। किंतुकतिपयतुप्यारी" अवलंबौसखिन् पश्चपद्चिह्नितामगच्छमह:।।

ज्यू फूल से मुस्काये

ज्यू फूल से मुस्काए लला,फूल हु लजाए गए। नैनन दमक फीकी दामिनी करी अरी,यूँ हसि हैरे कोटि जि दामिनी गिराए दए। गन्ध सुगन्ध सरी ढापै मुख कित्त परी,जे सुवास सरस सल्लिलल बिखराए हाए। लोकि बिलोकि शुषक जिय भाव भरी,देखि "प्यारी" प्यार सो ना कु-नजर गिराए जए।

धीर न धरनै

धीर ना धरनै कहियो ओर। दशा म्हारै मन की सुधारौ अजी,पीर कौ जाकी ओर ना छोर। ह्यै नैन भये बाबरै दरश बिनु,दाहै मोहै बिरह अगन कौ घोर। छुपावू भरै जल सब सौ नयन,बिनु कछु कीयै ही भयौ हूँ चोर। जाय लाज पिय आवौ ना अब जो,सम्हारौ तारौ आपकौ जोर। छकै नाय खेलत अब लौ क्या जी,"प्यारी" कौ तौ छकियौ ओर छोर।

करमगत होई खराब रे

करमगत होई खराब रे,खबर ना लैवे पिय मेरे।। जल बिनु मछरी भाँति तडफी,चंदा चकोरी सु ज्यू हु बिछुरी,पूछै ना एक भरतार रे,खबर ना लैवे पिय मेरे।। करमगत.... आवन आवन सुनि बडै दिन तै,आवत दीखै ना पिय कोउ दिश तै,झिझावू रोवू कछु करू काज,खबर ना लैवे पिय मेरे।। करमगत..... फागन सावन जोवन गए सब,नैननि आस मिलन रही नाय अब,जावै नाय काहै बैरी प्राण रे,खबर ना लैवे पिय मेरे।। करमगत.... ऐसे देश पिय दई भेजी,आप दीखै नाय आली संग मे जी,रोवू खडी इकली ही आज रे,खबर ना लैवे पिय मेरे।। करमगत.... साँची बात कहो म्हारै गिरधर,थामौ बाँह प्रीत धारौ मोहर,"प्यारी" कह्यौ धीरज ना धार-नै,खबर ना लैवे पिय मेरे।। करमगत.....

कछु अधिक रङ्गिलौ

कछु अधिक रंगीलौ आज लाल तू। फागुन सुन्यौ जबतै तनै आवन,हो-हो होरी कहे सब उधम काम कू। नीलौ पीलौ गुलाल लाल गाल करै,छुवै सब सखी इत्त उत्त हरत लाज कू। लाज खूँटी टांग बिसारी तनै निर्लज्ज,नाय तौ सम ओरि कोई सगरी या भू। जई लठ्ठ परेगौ प्यारौ होरी होरा भयौ ताई,"प्यारी" दए न्यौता आवौ अजी बरसाने गाम जु।

बिरथ स्वांग सब तुम बिनु

विरथ स्वांग सब तव बिनु। ज्यू दैहि प्राणन बिनु आधी,रवि बिन निशीही दिनु। ज्यू सिंगार लाज बिनु नारी,बिन शक्ति शव शिवहु। सुभाग रेख सैंदूर सुभागन,त्यौई "प्यारी"अधी बिन तुम्हु।

और करोगे कब लौ

ओर करोगै कब लौ। अनदेखी पिय चरण धूरी को,खाक भई देहि तौ। पहेली अबूझ जनम जीवन सब,बूझौ ना बात बनी च्यौ। "प्यारी" नैन निहारत मारग,थकी गई नैन तकी ह्यौ।

बिरह अगन भई तेज

बिरह अगन भई तेज। देहि छाडि राख करि सबही,कछु ही बचिहौ न लेश। नैननि जल सौ भभकी बढी दूनी,रैन दिवस ही हमेश। बूझत बूझ जानि तऊ सुनियौ,जे करियौ उपाय ब्रजेश। आनन चंद्र दिखा करौ शीतल,जीय तिरपत हौ क्षणैक। मधै छाडौ ना तौ हसी तिहारी,जए "प्यारी" लाज सर्वैश।

मोहे दर्शन दो घनश्याम

मौहे दरशन दो घनश्याम,बिरह की बहौत भई लीला। नैन सुफल कीजौ होय सम्मुख,ना तौ लिजौ जोति आप,बिरह की बहौत भई लीला। सुवास बसि करौ आप सुहासी,साँस साँस बसि जहौ नाथ,बिरह की बहौत भई लीला। हसन कहन नुपुर रूनझुन थारी,दूजी आवै सुनाई ना बात,बिरह की बहौत भई लीला। सब छूवन मनन सोचन बस तुम्हु,बसौ नैनन भरै जल जात,बिरह की बहौत भई लीला। बिजुरी भाँत पल छिन गिरै मौपै,जिय होवै नित व्रज-पात,बिरह की बहौत भई लीला। पिय दैखू सोई दिन कद निकरै, "प्यारी" मैटौ कारी रात,बिरह की बहौत भई लीला।

नाथ मोहि जग से उबारौ अब

नाथ मोहि जग सौ उबारौ अब। देखै  रंग  पिता   माता कै , देख लिए सगे संबधी सब। भौगै भोग विषय बिष झूठै,द्वैष मोह काम क्रोध अरू मद। रोग निरोग दरीद्दी समृद्धी , जनम सौ मरण अवस्था ढब। प्रीति क्रौध जग रूठन मनावन,चाहै मन कछु दीन्है गए थौप। सब सौ थकै छकै आप पुकारै,"प्यारी" पिय टेरि सुनौगै कब???? .....……..."प्यारी" पिय टेरि सुनौगे कब????

तव सुख ही मम सुख

तव सुख ही मम सुख कौ लालच। तुम रस रंग डूबत तरत भौर निशि,हम पौढे रहत ड्योढी हित आवन। चिन्ह रति भोग जोग अंग दरशत,हम हसि पूछत कहि रैन बतावन। कदि पलटि साज बिहार बात जब,दोउन हिली मिली सुलह करावन। खेलनि खेल बहु रूचि विनोद रचै,भलि हार जीत करि मंगल गायन। येई आशीष "प्यारी" लाललडैती दुई,लेओ देओ खूब हसि आनंद मनावन।

रार ठाई अबिकै

रार ठाई अबिकै तुम मोहन। ह्यौ सूधी राह जात गाम की,नित भाँति गैय्या हु दोहन। तुम मैय्या भरि दए कान ही,झूठी साँचि रे बात बतावन। जोई सुनि हम कर कान दबाए,देखि दूर हसै ठाडै हम रौवन। पाछै पूछै वारै बात लै चुटकी,खूँटी धरि दई लाज तौ तारन। अरू सैन चलाए नैन तीखै तै,जानि बेबस अति भौह नचावन। सोह लेउ छैल तौ मजा चखाऊ,ना तौ कोउ"प्यारी" नाम ना जानन।

मैं तो भई दीवानी गिरधर की

मै तो भई दीवानी गिरधर की। जिन गिरधर गोपिन उर छीनै,छाडी न उनने घर-दर की। अरू छाडी उर छाडी फिर उन्हु,कैसी रीत रंगीली भई प्रीतम की। छाडी तो छाडी आई जाई तरसाई,तरसाई इक-इक पिय दरसन की। अरू इतनोई पै बात बनी‌ नाय,छुपि पूरी कमी करि तरफन की। कछु ऐसौ पिय नाय बात बनिहै,"प्यारी" लौटावौ नाय निज निधि अपनी।

करत केलि मध्य जल

करत केलि मधै जल दोउ। झाँकत बदन बसन झीनै तै,उपमेय उपमा कौन कोय होउ। ओरि प्रिया इक लाल दूसरौ,सखियन सेतू आनंद मधै जोउ। बाढी तरंग खेलि कछु ऐसौ,लांघि अलिन जाई प्रिया छोउ। जीतौ प्रिया मलय अंग छुरावौ,हारौ प्रिया पुनि अंग संजोउ। वीचि भाँत फिरत जल भीतर,डूबत तरत धरत दाँव कोउ। बाहिर आय पुनि कूदै गहरै,अंग भीतर भीतर पांयन धोउ। बद्ध गाढ आलिंगन चर्चित छुरावै,"प्यारी" हारौ जीतौ भली चहै दोउ।

मम अंब हे श्री यमुने

मम् अंब हे श्री यमुनै! रसप्रदायिनि तोषदायिनी,प्रियौहृद्गामिणी आह्लादिनी शौचऽशौचनिर्वर्तिनी   ,   नेहऽमूलारोपिनिहृद यमुनै! मम् अंब हे श्री यमुनै। कृष्णांड़्ग्वर्णिनी हृद्श्रीप्रियौरमणि केलिरसौनिमज्जिनि सेतूप्रियाप्रिऽयौजिनि भागिभाँतिकिलोलिनीसद् यमुनै।

गोचारण हित होत त्यार

गौचारण हित होत तैयार। केसरी पाग पिताम्बर धारै,काली कमली कांधै डार। विविध भूषण मोतिन कनकादि,श्रृंगी लकुटी इक हाथ। ड्यौढी राजै करत आरतौ,आजु भेजत माय दुलार। भीर अहीर बाल बालनकौ,"प्यारी" शौभा ज्यूँ त्यौहार।

पूर्ण चन्द्र हृदय

पूरण चंद्र हृ्दय नभ उतरै। पौर्णमासी कछु भई यथा सी,नैननि नैन पूरित मद उजरै। पुलकित हृ्दय कोऊ तरंग नवी ही,चंचल चित्त चर्चित अंग उकरै। मुस्कनि स्मित अतरंग छलक छाई,"प्यारी" अंगनि अंग गलित सुख दुखरै।