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युगल निरख

युगल निरख, शीतल भई छाती। मूक पीयो रस सुधा छबीलौ, कहन सुनन; बातन नाय आती। नीको लाल मलूक सींव परै, अंतर ललक, निरखि बटि जाती। ललित लाडिली अनुप मधुरै, मंद हसन, झुकी निरख लजाती। कुमुद मूल एक दोउ निकरै, अंग-अंग "प्यारी", जूरी सब पाती।

स्तुति

हे विवस्वानसुते! देहि अनुराग युगलचरणौ। निजऽस्तित्व समाहित सर्वैसर्विस्मृतेषांत्वंसदृश:।

नहि मौन धरौ

नहि मौन धरौ,कछु बात करौ। भई रार जई नहि बात नई,तजि भूलौ बिसरौ,उर हाथ धरौ। अंतर उपवन बंजर सम वन,फागुन लावौ नेह लाड करौ। अंचर ढरकि मनुहार करी,नाहि तजि जावौ आय बाँह वरौ। प्रीतम सैय्या दै गलबैय्या "प्यारी" झुकि झुकि मनुहार करौ।

अरी का कौ फाग

अरी का कौ फाग,काय हर्षाती। जरे बरे दिनु आय मरै,हू तौ बरसौ बरस योई कल्पाती। का केई संग होरी मोरी होई,जिन संगै चही उन कासौ मनाती। सुन जा दिनु हाथ चढ्यौ दारी के,दौरा दौरि दौरि"प्यारी" रंग खिराती।

हरि आए संग

हरि आए संग आप हमारै। कहा करू वृंदावन जाई,गंगा जमुना च्यौई नहाई,जु जई संग फिरत अगारै पिछारै। देखू क्यौई चित्रपट इनके,कल्पना कोरी करू क्यू दिनमै,जोई सन्मुख आप बैठे मुस्कारै। लगा काजल इत्र भरू क्यू भेषा,धारी गेरूआ लऊ क्यू वेशा,जई ऐसोई आप लए अपनारै। सोच विचार करू किस कारण,लोक लिहाज करू क्यू धारण,जानू आप भ‌ए "प्यारी" के प्यारै

सखि रैन

सखि रैन कहौ किस भाँति बिताई। द्युति दौरि गई अंग रैन विचारिकै,टेढी रमणी देख रमण मुस्काई। इंगित करि इक सुमनि ढुरकितै,रहै हिरि तजि जोई भ्रमर ललचाई। रस छाप दृश्य भई कुच कछुक तई,बही पौन जई अंचल ढलकाई। फसि वेणी देखि कंकण नग नागर,काढि "प्यारी" लेई लाल ओरि बढाई। हसै मोहन निज पटा दिखाए,जो लली नुपुर लटिकै पायल खोई पाई।

अवतरै श्री राधारमन

अवतरै श्रीराधारमण आज। पुलकित मंज्जरी किंकरी सखिन,पुलक ह्रदय सुख संत समाज। अनुपम रूप छबि मदमाती,शीतल होय निरखि मुख ताप। चटिकाय अंगुरी तोरि तृण निरखौ,"प्यारी" हृदय सिंहासन कियौ विराज।