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Showing posts from April, 2024

जो ढीठ भये

जो ढीठ भयै तुम ह्यौ कम नाही। मनमानी अब लौ चली थारी,जोरा-जोरी करि मोय सताई। झूठै बैननि सैननि सब झूठै,झूठी-साँची बातन लैई फसाई। अनगिन बारि जोरि कर रोई,देई-देई रोई हु प्रीत दुहाई। सूधी बातन सुधै संगै चलिहै,टेढै-मेढै संग बनै बात लराई। सौह-ह्यौ थारी ठाई औरि न मानू,अबलौ जौ लई "प्यारी" लेई बनाई।

उदित सविता लाल

उदित सविता लाल। श्रीराधारमण नैननि डोरै,कहत निशि सब हाल। अंजन छुटै लूटै रसही-रस,छिटकी परै लट बाल। टूटै बंध बसन कछु खुलै,नाय पतौ गल माल। नीची नैन दैखिहौ "प्यारी",कर जोरि झुकै भाल।

लय लिकुटी चलै

लए लकुटी चलै गऊए चरान। हसि बतियात ठठात पीटत कर,चलै सखा संगी हसि हसान। कटि बाँधै सब पोट भोज बनै,निज बैठि खोल सबहु अपराह्न। चखै लाला सब भाँत नेह रचै,रूचि रूचि लैत सुवाद   चटकान। साँझ फूँकी श्रृंगी टैरिही गैय्यन,करि "प्यारी" मग जोहवै दीपदान।

हरि दासी मग जोहवत

हरि दासी मग जोहवत हारी। बसै देस हम कौन जानै,नाय जानै किस तुम देस सिधारी। बिसर भूलै आवै खबर कोउ,भूल बिसर गयै आपहु प्यारी। नैन कहै कछु होय ना अबतौ,हिरदै बिबश प्रीत आस बंधाई। जग दिखा हाँसू छुप रोवू हेजी,कोऊ बात नाय बनत दिखाई। निरमौही हम मोह फसाकै,ज्ञान पढाए नाय बात विचारी। "प्यारी" काज कोऊ की ना छाड,धाए बात नाय आछी थारी।

राधे करुणामय जु

राधै करूणामयी जु कृपा कीजिए,चित्त चौप टहल की मेरे दीजिए। दासी बैठी है कबतै तेरे द्वार पै,नेक बिनती या दासी की सुन लीजिए। गयौ जनम विरथ ना मरण भी जए,स्वास अंतिम सौ पहलै बचा लीजिए। लोक लज्जा विषय विष विरह व्यर्थ के,इन सबकू जगह निज चरण दीजिए। निज चरणौ की ना दासो की दासी कर,रस प्यारी पिपासा बढा दीजिए। कहै अंतिम यही "प्यारी" कर जोरि कै,जु कछु करिकै किशोरी बुला लीजिए। .....जु कछु करिकै किशोरी बुला लिजिए।।।

ना जाने क्यूँ

ना जाने क्यूँ हमेशा ,ये रास्तै हमे आजमाते है हम किधर से भी गुजरे,फिर वही लौट आते है। मौहब्बत है शायद,इन तन्हा राहो को भी हमसे हर कोई कहाँ भला"प्यारी",इनसे गुजर पाते है। क्या समझेगा कोई,टीस उस दिल की कभी ही अश्क जिसके निकलने के पहले ही,सूख जाते है। वक्त देते ही नही अब,हम खुद को उनके जितना क्या हुआ?क्या है?क्या होगा?,जो सोच पाते है।

चल सखी

चल सखी पुनि पिय की नगरी। या जग कोऊ न मीत हमारौ,नातै ना बोझ गठरी। ना सौहै नैन इन कोऊ बिचारौ,आनि पिय मग तक-री। वा दिनु सौ सिंगार बिसारी,जासौ तुव गयै तज-ही। ह्यौ बैठि आजु बाँह पसारि,गहौ लहौ "प्यारी" संग सगरी।

ए हे सखी

ऐ हे सखि! मंगल गान करौ। उर कबतै नैननि अब आनै,झुकि झुकि सबकै पाम परौ। कहा करिहु सिंगार साज सजू,ठाडी काय हाथ पै   हाथ धरौ। रचू बीडा रूचि रस उन सानै,इक-टक नैननि राह धरौ। इक पलहु जुगहु मन मानै,बेगि बेगी "प्यारी" पिय पाम धरौ।

वां दिन की

वा दिन की कहा कहू री सजनी। दिन पायन चोपन चित्त लागी,सहज हसि कही कर लए पगली। देखि पुहुप गुंजा गुहि वेणी,इंगित करि लट लटकी सो अंगुली। चटपटि उर सज्जा हित शयनी,संगै सखी लए जाय आजु रजनी। सुभाग भाग मुख कौन सराहू,करि "प्यारी" नेह निज लाड सो अपनी।