सखि रैन
सखि रैन कहौ किस भाँति बिताई। द्युति दौरि गई अंग रैन विचारिकै,टेढी रमणी देख रमण मुस्काई। इंगित करि इक सुमनि ढुरकितै,रहै हिरि तजि जोई भ्रमर ललचाई। रस छाप दृश्य भई कुच कछुक तई,बही पौन जई अंचल ढलकाई। फसि वेणी देखि कंकण नग नागर,काढि "प्यारी" लेई लाल ओरि बढाई। हसै मोहन निज पटा दिखाए,जो लली नुपुर लटिकै पायल खोई पाई।