इस विरह व्यथा को तुम क्या जानौ?तुम ठहरै अखिल विश्वपति,परमहंस परै मोह प्रेम रति।

इस विरह व्यथा को तुम क्या जानौ?
तुम ठहरै अखिल विश्वपति,परमहंस परै मोह प्रेम रति।
रस मोह पाश सब तुम क्या मानौ?
तुम ज्ञानी तम दीप जलाते,पथ पथिक पंथ सब स्वयं बनाते।
पथ विहिन पथिक मर्म तुम क्या जानौ?
तुम इच्छा तुम भाति चलै सब, प्यारी और चहै क्या तुम फर्क पडै कब।
 क्या सम वस्तु सा जीवन तुम क्या जानौ?
इस विरह व्यथा को तुम क्या जानौ?
पीड सूखी लता कौ तुम क्या जानौ?

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