श्री राधा बस सब कछु तिहारै। सद्गति दुर्गति एक थारी सम्मति , नैन सब सौ थकै आप ओर निहारै। कांकरी साँकरी ठोक पीट साध-री,हित मलयज घिसन ही राखि लेओ द्वारै। जग फसि देखि हसि काढौ हरि प्रेयसी,निज कर देई ना तौ लकुटी ही के सहारै। बलिहारी " प्यारी" लली दया तिहारी , देखि करूणा धन- धन जीवरा पुकारै।
बीरि देत सहज मुख सजनी। श्री राधारमण रोकत मधैई,निज कर लेई देखि रहे अवनि। हसि पतियाई करत मुख झौरे,जानि सुफल प्रीतम रस रजनी । धरत बीरि मुख अधर टटौलै,श्रीप्रिया आनि घिरी मुख लजनि। देखि चपल चपला कछु हाँसि,"प्यारी" बलि जोरि रस कथनी।