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Showing posts from September, 2022

आखर बैरी

आखर बैरी मौन हौ परै। उर फसौ छबि पुनि पुनि धकियावै,च्यौ नाय कछु प्राण पै वरै। जग फसौ देहि कछु कछु कल्पावै,सामन कौ जल नैन सौ झरै। मौन धरयौ कहि नाय नाय खसियाकै,"प्यारी" पाटन बीच द्वौ मरै।

श्री राधा बस सब

श्री राधा बस सब कछु तिहारै। सद्गति  दुर्गति  एक थारी सम्मति ,  नैन  सब  सौ थकै  आप  ओर निहारै। कांकरी साँकरी ठोक पीट साध-री,हित मलयज घिसन ही राखि लेओ द्वारै। जग फसि देखि हसि काढौ हरि प्रेयसी,निज कर देई ना तौ लकुटी ही के सहारै। बलिहारी " प्यारी" लली दया तिहारी , देखि करूणा धन- धन जीवरा पुकारै।

हमें तो वृन्दावन सोई प्रीति

हमै तौ वृंदावन सोई प्रीति। रज वेणु धेनु गोप गोपिन,रास रस सखी सहचरी रस रीति। लली लाला लता पता कालिंदी,टहलनि महल बसै प्रिया पी की। जन्तर मन्तर साधन सघन बन,इन्हीमेई होय सबकोई प्रतीती। सखी बंधु सखा मात पिताई,वारै इन पुनि फसनौ उर भीती। "प्यारी" बिनती गिनती नाय कितनी,भाँति रहू पंक परी घृत सी ही।

सखी झूलत हिंडोरा

सखी झूलत हिंडौरा श्री राधारमण। दोउ बिटप तमाल सघन चढी वल्लरी,होय मिलित करै दोला वृंदावन। सजै सुमनि सुगन्धि भाति नव रंगनि ,बाढी शोभा जई राजै मनहरण। उर लाड लडैति झूलात "प्यारी" सखी,शीतल भयौ उर देखिकै हसन।

रे माधौ

रे माधौ ! जानि फँसाई तैने। जानत ह्यौ तौ बौरी बैरागन,ताई आय सुधिही पुनि दैने। पुगत नाय जाय जानौ झमैलौ,कहि सुनी लई लपटाई बैने। सूधै काज नाय जानूथौ यौ तौ,देखि लए नैननि सोई मैने। हसि तौरि मौरि भई प्राण पै,"प्यारी" पिय बहौत छकाई तैने।

तुम सम कोऊ न

तुम सम कोउ न हे! ब्रज रानी। सरबस निधि देई देओ रीझी,ऐसौ दीन दयालु तौ दानी। प्रीतम निज बाँटि जग अघनै,नित पावै नव रस देखि मुस्कानि। करूण पुकार सुनि द्रव द्रवितौ,उर छिन अध अरध विषाद मिटानि। ओर कौन कौ कहै कछु क्योई,जगपति "प्यारी" इन छकै छकानि।  पघै रस अघै नाय रसिक अनौखै,ऐसौ रसिक हु की तुव रसरानी।

बीरी देत सहज

बीरि देत सहज मुख सजनी। श्री राधारमण रोकत मधैई,निज कर लेई देखि रहे अवनि। हसि पतियाई करत मुख झौरे,जानि सुफल प्रीतम रस रजनी । धरत बीरि मुख अधर टटौलै,श्रीप्रिया आनि घिरी मुख लजनि। देखि चपल चपला कछु हाँसि,"प्यारी" बलि जोरि रस कथनी।

करत कुलाहल शुक सारिका

करत कुलाहल शुक सारिका , कुंज  बिटप   प्रभात। मुदित सखिन सजनी सब हर्षित,नव चेतन भरै गात। लटपटै पग बिथिन दोउ निकरै,कहन नाहिन आय बात। मद लोचन रति चिन्ह दरसाए,भूषण बसन अरूझात। दोरि सब हित टहल टकौरि,रस पूछत हसि बतियात। "प्यारी" निरखि भरी रस बरखा,कौन जगत पुनि च्हात।