करत कुलाहल शुक सारिका
करत कुलाहल शुक सारिका , कुंज बिटप प्रभात।
मुदित सखिन सजनी सब हर्षित,नव चेतन भरै गात।
लटपटै पग बिथिन दोउ निकरै,कहन नाहिन आय बात।
मद लोचन रति चिन्ह दरसाए,भूषण बसन अरूझात।
दोरि सब हित टहल टकौरि,रस पूछत हसि बतियात।
"प्यारी" निरखि भरी रस बरखा,कौन जगत पुनि च्हात।
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