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Showing posts from January, 2022

वे मेरे

वे मेरे,मै उनकी प्यारी। सगरौ जग छबि एक बस्यौ है, सिर मोर मुकुट बंसी जिन धारी। मुस्कनि एक परस्पर रस हित,एक रस सौ सिञ्चित सृष्टी सारी। औसर रहत तकत हित मिलनौ,करै नित स्वांग नव नवल प्रकारी। गए पाठ जाप दरशन सुमिरण सब,रिझन रिझावन रहै उमर निकारी। "प्यारी" बड-भागिनी करि धूरिकौ,उर लपटाए बिना बात विचारी।

झुकी झुकी देखे

झुकि-झुकि दैखे श्रीराधारमण। बंशी धारै गए स्वर बिसरै,देखि झलक जई  मानिनी नयन। मुख मुस्कनि अटकि गई मधैई,ज्योई दैखि सुतै किरती हसन। दृग झुकि गए अनुपम रस आदर,अति लए तरंग सिंधु उर मदन। दोउ अनु-दान रस करै परस्पर, सखी "प्यारी" येई बिनती इन चरण।