झुकी झुकी देखे
झुकि-झुकि दैखे श्रीराधारमण।
बंशी धारै गए स्वर बिसरै,देखि झलक जई मानिनी नयन।
मुख मुस्कनि अटकि गई मधैई,ज्योई दैखि सुतै किरती हसन।
दृग झुकि गए अनुपम रस आदर,अति लए तरंग सिंधु उर मदन।
दोउ अनु-दान रस करै परस्पर, सखी "प्यारी" येई बिनती इन चरण।
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