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अलबेलै रमण

अलबेलै रमण मुस्कात। देखि कुँवरि रस रूप लाडिली,अंतर मेई ललचात। कोवलता अंग छूवत बनै नहि,धरनौ कर सकुचात। दशा अंतर जानि पिय प्यारी,सहज निकट आप-आत। भीजी गयौ सखी"प्यारी" सब कछु,होए नैनन बरसात।

झूलनी सामन

झूलनि सामन रीत हो सजनी। बरसत बदरा उमड घुमड बहि,अंतर हठी मेल बात कौ सजनी। भीजत साज सिंगार गात सब,भीजत हिय हित प्रीत सो सजनी। जावत छोर ओढनी उर बँधिकै,सरसत जई झौट खात वौ सजनी। नैननि लेत सिरात हिय "प्यारी", मुस्कनि संग झुकी जोट जो सजनी।