अलबेलै रमण

अलबेलै रमण मुस्कात।
देखि कुँवरि रस रूप लाडिली,अंतर मेई ललचात।
कोवलता अंग छूवत बनै नहि,धरनौ कर सकुचात।
दशा अंतर जानि पिय प्यारी,सहज निकट आप-आत।
भीजी गयौ सखी"प्यारी" सब कछु,होए नैनन बरसात।

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