वे मेरे

वे मेरे,मै उनकी प्यारी।
सगरौ जग छबि एक बस्यौ है, सिर मोर मुकुट बंसी जिन धारी।
मुस्कनि एक परस्पर रस हित,एक रस सौ सिञ्चित सृष्टी सारी।
औसर रहत तकत हित मिलनौ,करै नित स्वांग नव नवल प्रकारी।
गए पाठ जाप दरशन सुमिरण सब,रिझन रिझावन रहै उमर निकारी।
"प्यारी" बड-भागिनी करि धूरिकौ,उर लपटाए बिना बात विचारी।

Comments

Popular posts from this blog

हरि आए संग

कहा प्राणन

तुव बिन पिया