हमें तो वृन्दावन सोई प्रीति
हमै तौ वृंदावन सोई प्रीति।
रज वेणु धेनु गोप गोपिन,रास रस सखी सहचरी रस रीति।
लली लाला लता पता कालिंदी,टहलनि महल बसै प्रिया पी की।
जन्तर मन्तर साधन सघन बन,इन्हीमेई होय सबकोई प्रतीती।
सखी बंधु सखा मात पिताई,वारै इन पुनि फसनौ उर भीती।
"प्यारी" बिनती गिनती नाय कितनी,भाँति रहू पंक परी घृत सी ही।
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