तुम सम कोऊ न
तुम सम कोउ न हे! ब्रज रानी।
सरबस निधि देई देओ रीझी,ऐसौ दीन दयालु तौ दानी।
प्रीतम निज बाँटि जग अघनै,नित पावै नव रस देखि मुस्कानि।
करूण पुकार सुनि द्रव द्रवितौ,उर छिन अध अरध विषाद मिटानि।
ओर कौन कौ कहै कछु क्योई,जगपति "प्यारी" इन
छकै छकानि।
पघै रस अघै नाय रसिक अनौखै,ऐसौ रसिक हु की तुव रसरानी।
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