बीरी देत सहज

बीरि देत सहज मुख सजनी।
श्री राधारमण रोकत मधैई,निज कर लेई देखि रहे अवनि।
हसि पतियाई करत मुख झौरे,जानि सुफल प्रीतम रस रजनी ।
धरत बीरि मुख अधर टटौलै,श्रीप्रिया आनि घिरी मुख लजनि।
देखि चपल चपला कछु हाँसि,"प्यारी" बलि जोरि रस कथनी।

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