मैं तो भई दीवानी गिरधर की

मै तो भई दीवानी गिरधर की।
जिन गिरधर गोपिन उर छीनै,छाडी न उनने घर-दर की।
अरू छाडी उर छाडी फिर उन्हु,कैसी रीत रंगीली भई प्रीतम की।
छाडी तो छाडी आई जाई तरसाई,तरसाई इक-इक पिय दरसन की।
अरू इतनोई पै बात बनी‌ नाय,छुपि पूरी कमी करि तरफन की।
कछु ऐसौ पिय नाय बात बनिहै,"प्यारी" लौटावौ नाय निज निधि अपनी।

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