ब्रजरस ब्रजचन्द कोउ न सींवा
ब्रजरस,ब्रजछंद कोउ न सींवा।
देश काल जाति बाँधि सकै न,लांघि बाँध जन-जन जि जीवां।
नेह प्रेम रस भरै सब आखर,ज्यू बौलै टपकै रस अति जिहा।
मति गति प्रेम सौ प्रेम डुबोए,अजी बोलत बोल प्रेम बल लिवा।
बिनु जानि सब जानि प्राण देय,मुखर मधुर सहजई उर रीहा।
मुख समता कौन कहै ब्रह्मानंद,"प्यारी" बिरह्म वारै ह्यौ तौ तजि कीवां।
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