धीर न धरनै
धीर ना धरनै कहियो ओर।
दशा म्हारै मन की सुधारौ अजी,पीर कौ जाकी ओर ना छोर।
ह्यै नैन भये बाबरै दरश बिनु,दाहै मोहै बिरह अगन कौ घोर।
छुपावू भरै जल सब सौ नयन,बिनु कछु कीयै ही भयौ हूँ चोर।
जाय लाज पिय आवौ ना अब जो,सम्हारौ तारौ आपकौ जोर।
छकै नाय खेलत अब लौ क्या जी,"प्यारी" कौ तौ छकियौ ओर छोर।
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