डाली डोल कुसुम

डाली डोल कुसुम हित रमण।
चुनत बरण आकृत भाँति भिन्न,राजत मधै बाढि हित सबन।
मचत होर बढि-बढि सेवन हित,अतिही निकट चहै सब परन।
धन धन भाग पुहुप धन उन्ही,औसर परै "प्यारी" जिन तकन।

Comments

Popular posts from this blog

हरि आए संग

कहा प्राणन

तुव बिन पिया