जग तारण
जग तारण कारण लली आई।
करि लाल संग रास रस लीला,प्रीत रीत जग नवी सिखाई।
बिषय भोग तजि नेह परस्पर,प्रेम साँचौ कहा आप बताई।
दाँव धरि निजता रस द्यूत मे,प्रिय प्राण बनी आप गमाई।
तत्सुखमयी लीला रचि रूचि सौ,प्रेम गुरू बनी प्रेम लुटाई।
अति कहै मुख कौन सौ"प्यारी",अथाह जलधि कँहा माट समाई।
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