काक दूतं

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कुन्जेषुतिष्ठौ खगः मृदुकलरवश्रुत्वाम् श्रीतरूणी निमग्नितः ।
तद एकः काकस्यस्वरं श्रुणतः श्रीराधा अतिविस्मितौभूत्वा तम् पश्यति।
इति दृष्टं सखीललिता सहमन्दहासच्सुमधुरवचनौ महाभाविनै पृच्छति।
सखि किम् कारणेतु तेषाम्ऽधुरकलरवं त्यजः सः काकः कर्कशौध्वनि श्रौणति।
एतत् श्रुत्वाम् सम्मोहितौसमः काकऽकलरवं कृष्णमोहिनी इति वदति।
सखि ! सामान्यत: सर्वैकाक: काह! काह! इति धवनि श्रृणु उच्चारति।
अद्य: स: काक: आऽ! आऽ! इत्तथम् कलरवकर्तुं किं त्वं न श्रुणौति?
स: श्रुत्वां ! ललितादिसंड्गै सर्वाणि सखिन् हसिवदतिचलाडौ: चिबुक:पलौटति।
अहो सरला: ! श्यामसुन्दरौऽद्यपि न इयात: इतिकारणौऽस्तु स: त्वं अनुभवन्ति।
न सखिन् स: निश्चितौऽस्मि एष: काक: मम् प्रियतम: दूतौ भवति।
इदृशं कदापि श्रीकृष्णौ कस्यऽन्यत्रौ न तु मम: प्रतिक्षयति।
यदा स: वदति प्रष्ठै तदा यत् प्राणप्रियतमौ समीपै सहसा प्रगट्यति।
हृदयै मिलित्वां तेषां दृश्यै सर्वाणि सखिन: हृदयै शीतलौऽपि भवति।

🦚 _______ लीला _______ सूर्य और चंद्रमा के मिलन का समय है।कुन्ज मे बैठी हुई श्री प्रियाजु पक्षियो के मधुर कलरव मे निमग्न है। इसी समय प्यारीजु एक कौए की वाणी सुन बडे ही आश्चर्य सै उसकी ओर देखने लगती है।ये देखकर ललितासखीजु इन महाभाविनी श्रीप्रियाजु से सुन्दर वचनो मे पूछती है---हे सखि! (श्रीराधा) क्या कारण है कि तुम पक्षैइयो के इस मधुर को त्यागकर इस कौए की कर्कश ध्वनि को सुनती हो।
ललिता सखी के ऐसे वचन सुनकर ,उस कौए की वाणी से सम्मोहित सी हुई ये कृष्णमोहिनी कहती है___सखि साधारणत सभी कौए काह! काह! ऐसा बोलते हुए सुने जाते है न,,,,,
किन्तु आज यह कौआ आ! आ! ऐसा शोर कर रहा है क्या तुम नही सुन पा रही हो?
यह सुनकर ललिताजु के संग सब सखिया हसते हुए श्री प्रिया जी की ठोडी को लाड से पकडकर कहती है____ अरे हमारी भोली राधा! श्यामसुन्दर अभी तक यहा नही आए न इसीलिए तुम्है ऐसा प्रतीत हो रहा है।
श्री राधा पुनः कहती है_ नही सखी मुझे विश्वास है कि निश्चय ही यह हमारे प्रियतम का भेजा हुआ कोइ दूत ही है।क्या पता ऐसा हो की प्यारेजु किसी दूसरे स्थान पर मेरी प्रतिक्षा कर रहे हो।
अधीर होकर ऐसा कह ही रही थी प्यारी जु की तभी पीछे से प्राणप्रियतम अचानक 
से यही प्रकट हो जाते है।
और प्रियाजु दौडकर इनके ह्दय से लिपट जाती है और इन दोनोको यू मिले देखकर सभी सखियो का ह्रदय भी शीतल हो गये है।

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