खन्डित नाहिं करो नलिन री

खन्डित नाहिं करो नलिन री,हे पद्म कलेवर तरूणी नवल।
अनुग्रह भरि करो कटाक्ष मानिनि,नयन धरो कछु विकसिद कमल।
उत्कंठित रंज अभिसार सार हित,अलि अनुमोदन स्मित करो सुफल।
कुच पराग भार उच्चंड भये,देय अधर पात्र इन करो सरल।
उरू देय शीश करो सहज उद्वेलित,रस कूप नितंब सरस पियात।
अंकित पयोधर मलयज चित्रावली,क्षुद्र उष्ण श्वास निर्जल तपात।
रस आवेगित कंपित बिंब अधर,रसोज्जवल सहज याचक करो दान।
पुष्पहार कंचुकी आंदोलित अवलंबित,करो निज अनुज्ञा लेउ कर थाम।
मुख कुम्हलात गात भरे स्वेदा,अरूण नयन भरे जल जात।
काम रूचि भयी अति उत्कंठा,नाहि कामिनी काम करे कोई बात।
पटु अलिन सम्मुख करि प्रियतम,कही अतिशय सुख की गत रात।
यद्पि आतुर प्रणय प्रेम स्वयं,व्यर्थ तजो निशि क्यू मान।
देखो रस लंपट उर्ध्वनयनी,गुम्फित करि बैठे कर गुंजा माल।
अति रमणीय सेज रची मनमोहन,राजि समर करो आरंभ तत्काल।
प्रफुल्ल कुमुदानन रासेश सदा,रस वांछा निमित्त आकुल कुम्हलाए।
रस दृष्टि रमणी करो अनुग्रह,पुनि प्राणन गए रासेश्वर आए।
नित सुख वर्षणी वर्धनी प्रीतम,अद्य क्यू रस आकुल तरसाए।
माना मान हेतू रस वर्धन,पर बहोत हुई अब पिय कंठ लगाए।
सुनि वचन अलिन मंदस्मित प्रसारती,उठि कंठ लगी प्रियतम अलबेली।
"प्यारी" हर्षाए द्वौ हो लुंठित परस्पर,सब लता तरू कुंजनि सखी सहेली।

Comments

Popular posts from this blog

हरि आए संग

कहा प्राणन

तुव बिन पिया