कुमुद विजय

सावधान ! जो युगल के रसविलास को पुष्प के खिलने जितना 
सहज,सुकोमल और पवित्र माने वह ही पढे।
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-----------------  कुमुद:विजयोत्सव्  -----------------------
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मंगलम् युगल: दर्शनौप्रथमऽभिलाष: सखिन: निभृतौकुंजतिष्ठति।।
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सर्वां प्रतनौधवल: आवरणपट्टऽवघट्टच पुष्पशय्यापुष्पमध्यै पुष्पचूडामणिकुमुद्वौ प्रफुल्लप्राप्यंहर्षति।।
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कदाचन सम्पूर्णैक्षप: अतीवौऽतीवप्रफुल्लेनस्पर्धातुऽयासेन कुमुदद्वौक्षणैक्षणै अलस: जृम्भात।।
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यस्मात् युगलौगतक्षिप: चर्बिताम्बूलविटिका सुगन्धै सम्पूर्ण: निकुंज: सुगन्धितोऽस्ति।।
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तौ अवलौक्यतै सहसा सर्वदृष्टि रसौन्मादिनिकौमुदी कञ्चुलिकेनचक्षऽभयन्तरम् रसपूरितघटकुचौ नीलप्रतिकौस्थित:।।
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दृश्यं च सखिनां अवबुध्यति विजयीकुमुद: प्रफुल्लौस्पर्धातुगतरात्रौ अंतत: ।।
अधुनां स विजयोत्सवनिर्हायहित: "प्यारी" तौकुमुदौ एक: स्रकगुम्फतैसह:प्रमुदितऽलिन कुंजेषुचल:।।।
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---------------------कमल का विजय उत्सव---------------
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प्रसंग----- युगल के मंगलमयी प्रथम दर्शनौ का वर्णन।
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लीला विस्तार--------------
परम मंगलमयी युगल के प्रथम दर्शनौ के लिए सखियाँ निभृत निकुंज मे खडी है।
कोई सखीअत्यंत महीन उज्जवल पट हटाती है और कुसुम सेज पर कुसुमो के मध्य कुसुम शिरोमणि दो कमलो को पूरी तरह प्रफुल्लित हुआ पाकर अत्यंत हर्षित होती है।
कदाचित सम्पूर्ण रात्री ओर ओर खिलने की होड मे विथकित दोनो कुमुद रह रहकर अलसाए से जम्भाई ले रहे है,जिससे सम्पूर्ण निकुंज पिछली रात्री मे युगल द्वारा चर्बित बीडे की सुवास से सुवासित हो उठता है।
सखियाँ दोनो को यूँ निहार ही रही थी की सहसा सभी की दृष्टि रसोन्मादिनी कुमुदनि की कंचुकी के भीतर रस से भरकर छलकते हुए घट रूपी कुचो से झाँकते नील चिन्ह पर पडती है और सखियाँ समझ जाती है की ....
रात्री मे दोनो कुमुदो के खिलने की होड मे अंतत कुमुद ही विजयशाली रहा है।
प्यारी अब इसी विजय का उत्सव मनाने हेतु दोनो कुमुदो को एक ही माला मे गूथ उल्लासित सखिया कुंज की ओर लिए चलती है।

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