कैसो रहूँ

कैसो रहू
साँवरिया! कैसो रहू बिनु थारौ।
उदासी फिरू रैन दिनाहि,कदे झरोखा कदे द्वार लगे नैना।
मुरझत सूख्यै गिरत धराहि,बिनु जल सूख्यौ कुसुम सम रहना।
वृक्छ शाख ज्यौ सूखत पत्ता गिरिहै,त्यौ फिरिहै उडत संगै पौना।
हसँन ना भावै नाही भावै रीझना,भावै पीय म्हानै पल छिन रौना।
गिरधर म्हारौ म्हानै दरस अजहु देहौ,देहौ बिनु दरसन नाही अजहु रहना।

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