अति झीने बसन

अति झीनै बसन धरै वपु लाल।
झाँकत अंग अंग इन बाहिर,ढापत ढकै न रूप रसाल।
झर-झर झरत झरै सरिता रस,छुपै छुपाय सुगंधि कौ हाल।
आवै लोभ देखि मधै पट कौ,नेक उघारौ करौ ह्यौ निहाल।
"प्यारी प्यासी जनम अनत की,ओरि न तरसावौ पट यौ डाल।

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