ओर कछु न

ओर कछु ना
हिय ओर कछु ना चाही।
धुनि मुरली वास वृंदावन,छबि नैनन लए बसाई।
ठौर चरणा नित दरसन प्यारौ,जुगल चरण चित्त लाई।
गैय्या ग्वाल सखा खेल खैलत,कर सुघर कंदुक पकराई।
सखिन यूथ भृकुटि कौ बातन,राधा बैठी सजी सजाई।
नागर नागरी दरस करै प्यारी,कदि ऐसौ भाग जगाई।

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