चल मना
चल मना
चल मना मैरौ दौडि दौडि ब्रजधाम रे।
लाडली लली के गुण-गान तहा रट रे।
नवल किशोर नित स्वामी जहाँ स्वामिनी।
उहा ब्रज धुरि मे नित लोटत ललाम रे।
राधा राधा रटत सवेरे साँझ होय जँहा।
भजत लाल लली नाम निकसत प्राण रे।
कुंज लता बड्यौ ही साधु सिद्ध होय यहाँ।
इन्ही सो लिपट नैन बहवतौ खोय रे।
राखौ निज चरना बनाय निज चेरी ही।
प्यारी नित नित ही बिनती जे करे रे।
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