गयो अब लौ जन्म बिरथा

गयौ अब लौ जनम विरथा।
चाह ना उपजी सुख टहलन की,जोरि बिनु गयौ निर्-अरथा।
दरशन भजना भी हित स्वारथ के,बिनु स्वारथ हिय ना भजता।
फसिकै जग भयौ मूरख आपई,पग उन ओरि च्यौ न धरता।
दोष धरै उन किरपा ना किन्ही,औँधा धारै राखौ माट मन-का।
जनम विरथ योई बीत ना जावै,"प्यारी" सौप उन कर सुरथा।

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