ओ री किशोरी मोरी

ओ री किशोरी मौरि ,कौन मुंह कहूं मैं तोरि।
शेष मुख शेष कहि ना बिशेष,नागर नाय कछु अति कह पाय है।
जग रच्यौ जब सौ तब सौ हु बिरम्हा,गाय रहृयौ अब लौ ना तऊ पार पाय है।
ह्यौ तबहु मलिन मुख मनहु मलिन ते,कहौ किस भांति पार लाडली जु पाय है।
तऊ बांधि धीरज हौ बलि तौरे बल सौ,ललित लडैति जोडि-तोडि कछु गाय है।
जैसि किशोरी मौरि सरस पौरि भोरि,ऐहि जग कहा कोउ जगहु ना पाय है।
करि "प्यारी" बिनती किशोरी कर जोरि,कछु जाय जाय नाम सेवा ना जाय है।।।

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