हा राधे हा राधे कहत दृग बरसे
हा राधे...हा राधे...कहत दृग बरसे ।
रूठीकै बैठी हैं श्रीराधा , आजु श्याम गिरधर-से ।
मूक बनी बैठी पिय से , बैन सुनन को मनबा तरसे ।
दोउ मेलों कुँजन नित खेलों ,देखि सखिन मन हरषे ।
ए री सखी माधुर्य मिलाबों , दोउन को उर उर-से ।
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