यात्रा

यात्रा
चला रे मन चल चरणा हरि ठौर।
ध्यावत ब्रह्मा शेष महेष,ध्यावत निश हि भौर।
कोटि जतन करि हिय न आवे,बड्यौ बड्यौ मुनि ध्यानी।
सुधौ सरल सुभाव बस रहिहै, सोई सेवत इन्ही मनमानी।
कमल दल नील पंकज जैसौ,चरणा कोमल अति अनूप।
प्यारी रूप पूर्ण कहा निरखौ, रहै अट्क्यौ सदा चरणा कौ मूक।

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