कहो क्या देखा है कभी मेरी निगाहों में
कहो,क्या देखा है कभी निगाहो मे मेरी?
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बरसात के बाद की सुर्ख लाली का मंजर
दबी चीखो को बादलो के सुर मे कही......
कहो,क्या देखा है कभी निगाहो मे मेरी?
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इक खामोश उदासी वो तेरे ना होने की
टूटती आस घडी दर घडी फिर फिर वही......
कहो,क्या देखा है कभी निगाहो मे मेरी?
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हैरत तेरी खामोशी के अंदाज-ऐ-गुमां पे
गुमसुम ही बस तकती कहती भी कुछ नही.....
कहो,क्या देखा है कभी निगाहो मे मेरी?
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मायूसी ,सूनापन वो उनींदी सी नींदे
बोझिल पलको का गिरना उठना सदके मे बस यूंही....
कहो,क्या देखा है कभी निगाहो मे मेरी?
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इंतेहा मेरे उसके उर्स तकल्लुफ की अब इनको
देखे क्या कर गुजरे ये बेमुरव्वत कुछ नई....
कहो,क्या देखा है कभी निगाहो मे मेरी?
कहो,क्या देखा है कभी निगाहो मे मेरी?
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