वन्दनम् श्री हित: वेर्णुस्वरूपम्।

__________श्री राधा____________
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वन्दनम् श्री हित: वेर्णुस्वरूपम्।
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हम बंशी के अवतार स्वरूप श्री हित जु की वन्दना करते है।
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भुवनमोहिनी: सुशोभित: द्विपद्मधरदलम् कृष्णम्।
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वह वंशी जो समस्त लोको को मोह लेने वाली और जो श्री कृष्ण के कमल दल के समान अधरो पर सुशोभित होती है।
ऐसी बंशी के अवतार स्वरूप श्री हित जु की हम वन्दना करते है।
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अनुस्मरणी अहोबंशी: राधालिसहितं प्रियम्।
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वह वंशी जो श्री राधा को उनकी सखियो सहित अत्यंत प्रिय है और जिसे प्रियाजु निरंतर सुनते रहना चाहती है,ऐसी बंशी के अवतार स्वरूप श्री हित जु की हम वन्दना करते है।
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प्रस्फुरीणी: माधुर्यपति: रसोद्गारगाढ ह्रदयम्।
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जो रसेश्वर श्री श्यामसुंदर के हृदय के अत्यंत गहन भावो का सहज ही विस्तार करती है,ऐसी बंशी के अवतार स्वरूप श्री हित जु की हम वन्दना करते है।
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सुस्पर्शै सुभोक्तयै हस्तमुख:लंघदेशै यद्- कदम्।
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वह वंशी जो युगल के सुंदर स्पर्श को प्राप्त करती है,जो कभी इनके हाथो कभी मुख और कभी इनके कटि भाग मे राजति है,ऐसी बंशी के अवतार स्वरूप श्री हित जु की हम वन्दना करते है।
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युगलरूपै समग्रहितं श्रीहितहरिवंशरूपं अवतरम्।
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यही वंशी हमारे युगल के सम्पूर्ण हित मंगल के लिए श्री हित हरिवंश रूप मे अवतरित हुई है,ऐसे बंशी के अवतार स्वरूप श्री हित जु की हम वन्दना करते है।
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अनुरंजित: रसालम्बनै भूप्रकाशितैन साधनम्।
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जो रस के आलम्बन है अर्थात जिनसे रस का अस्तित्व है जो रस मे पूरी तरह से डूबे हुए है उन युगल के इस दिव्य रस प्रेम को धरा पर प्रकाशित करने के जो हेतु(साधन) है,ऐसे बंशी के अवतार स्वरूप श्री हित जु की हम वन्दना करते है।
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सम:प्रियं प्रियाप्रियं भूरभूराधिप्रशंसितै निजमुखम्।
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जो प्रिया प्रितम हमारे लाडिलीलाल को एक समान रूप से प्रिय है और जिनकी भूरी भूरी प्रशंसा युगल अपने श्रीमुख से करते रहते है,ऐसे बंशी के अवतार स्वरूप श्री हित जु की हम वन्दना करते है।
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गूढभेदौक्तं कुंजादिकेलि रसोपासनापथ: विरचितम्।
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जिन्होने कुंज निकुंज आदि के गूढ रहस्यो को जगत मे कहा है एवं जिन्होने युगल रस उपासना के पथ का निर्माण किया है,ऐसे बंशी के अवतार स्वरूप श्री हित जु की हम वन्दना करते है।
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परिवर्तित: रसशब्दरूपं रसरहस्यौद्घाटितै जगतम्।
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जिन्होने युगल प्रेम रस के रहस्यो को रस से शब्द रूप मे बदलकर जगत मे प्रेम पिपासुओ के समक्ष उजागर किया है,ऐसे बंशी के अवतार स्वरूप श्री हित जु की हम वन्दना करते है।
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सुकोमलांगिनै द्विगौरसम् हितसुकोमार्रितिवत तंसेवम्।
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नवनीत के समान अत्यंत सुकोमल अंगो वाले युगल की प्रीति सेवा के लिए जिन्होने अत्यंत ही सुकोमल प्रेम रीति का प्रादुर्भाव किया है,ऐसे बंशी के अवतार स्वरूप श्री हित जु की हम वन्दना करते है।
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नाजानामिपूर्ण त्वंनवर्णम "प्यारीतांउत्सा
हितश्रीहितं" लिखितम्।
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आपको एवं आपकी वाणी को पूरी तरह नही जानते हुए भी(मतीहीन होते हुए भी) यह "प्यारी" श्रीहित जु को लिखने के लिए अत्यंत उत्साहित है और ऐसे बंशी के अवतार स्वरूप श्री हित जु की वन्दना करती है।
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क्षमस्वपदं यत्त्रुटिचेत: त्वंकर्तुदृढधारणाम् ह्रदयम्।
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प्रभु यदि यँहा मुझसे कोई भूल हो गई हो तो मै आपके श्री चरणो मे क्षमाप्रार्थी हूँ और मेरे हृदय मे यह दृढ विश्वास है की आप मुझे क्षमा कर देंगे।ऐसे करूणामयी बंशी के अवतार स्वरूप श्री हित जु की मै वन्दना करती हूँ।

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