वास वृन्दावन को
वास वृंदावन को
वास वृंदावन कौ पावै देहि।
कछु हिय वृंदावन बन्यौ,कछु वास ब्रज कौ धाम मिल्यौ।
देह देहि कौ भेद स्पष्ट हुयौ,झूठौ मान देहि दूर भयौ।
पीवन जमुना जलहु कौ,मांग टूक ग्वालन क्षुधा हरौ।
जिव्हा पौ राधा नाम रट्यौ,रज ब्रज कौ शीश धरयौ।
कुंज कुंज टेरत नंदलाल रह्यौ,लौटत रज मा देहि पड्यौ।
ऐ रे मन प्यारौ ब्रजधाम चल्यौ,जाय प्यारी कुंजन मा ही बस्यौ
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