सम तत्व च त्वयि
सम:त्वं च त्वयिधिक्यम्।
न ज्ञातं मम् न च इच्छतम्।
यत: मम् त्वन्यं न दृश्यम्।
जानामि त्वं च त्वं रूपम्।।६।।
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तुम्हारे समान भी कोई हो अथवा तुमसे बढकर कोई हो(संभव ही नही) ऐसा मुझे कुछ पता नही और न ही मेरी यह जानने की कोई इच्छा भी है।
क्योकी मै तुम्हारे अतिरिक्त कुछ ओर देखना ही नही चाहती तुम्हारे सिवा कुछ ओर मुझे दिखकर भी कहाँ दिखता है।सब मे तुम्हे ही तो ढूंढती रहती हूंँ।
मेरे प्यारे जु, मै आपकी प्यारी तो केवल और केवल आपको और आपके गुण( आपके नयन,आपकी मुस्कान,आपके श्रृंगार) आपके रूप को ही जानती हूँ,मेरे तो सर्व सर्वस्व आप ही है।
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