इनका पता इनकी जुबां

.............इनका पता,इनकी जुबां................
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सुनो,
.......मै वो नही जो तुम्हारी दीद-ऐ-नजर है।
.......वो भी नही जो तुम्हारी तमन्ना-ऐ-शहर है।
......मै हूँ वही जो इन चंद अल्फाजो मे मुखर है।
...........हूँ वही जो बसा  सुकूं  -   ऐ -  गदर है।
.......हाँ वही जो बुना हर नज्म - ओ - गजल है।
......बस वही जो दिल - ऐ- कागजातो मे अमर है।
......"प्यारी" वही जो अल्फाज-ऐ- दुनिया के उधर है।
.....सच,वही जो अल्फाज-ऐ-दुनिया के उधर है......
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( दीद-ऐ-नजर=आँखो के सामने,तमन्ना-ऐ-शहर=ख्वाहिशो की दुनिया,मुखर=अधिक बोलने वाला,सुकूँ-ऐ-गदर=आराम या शांति मे भी एक बैचेनी,दिल-ऐ-कागजात=उनके लिए लिखी हर रचना,उनकी यादे,अल्फाज-ऐ-दुनिया के उधर=शब्दो से परे'निशब्द:')

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