प्रेम पथिक

प्रेम पथिक
प्रेम पथिक सौई जानिहै,जोई सब कछु देई बिसार।
अपनोई इनकोई कछु नहि,जौ कछु होय तुम्हार।
हसि हसावै कृपा जानिहै,रौबतौ हु किरपा रहिहै बिचार।
जग राखै रोयै रहहिए,संग जावन कौ तैय्यार।
टहल महल रंग रास कौ,दीजै सबै त्याग बिचार।
ऐसेहु किरपा दासी पै,बेगि करिहै जुगल सरकार।

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