देख माधुरी रुप नागरी,
देख माधुरी रुप नागरी,लालच के मन लालच आय।
जिनकी कौर दृगन पायकै,पिय जानै निज बडभागन पाय।
मुस्कनि एक पै जिन सरबस,वारि डारि पिय अपनपौ चाहै।
एक द्युति नख पै जिनकी,अनगिन कोटि काम लजाय।
जिनकै रुप भँवर डूबिकै,पिय न कबहु निकरनौ चाहै।
जिन पायन पलौटन हितसौ,नित नव युक्ति पिय लडाय।
टेढी कौर भौँह पै जिनकी,कर जौरे पिय हा हा खाय।
"प्यारी" ऐसी प्राणप्रिया की,शोभा कहि कौन सौ जाय।
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