सखी देत बीरी
सखी देत बीरी
सखी देत बीरी कर रोकी जौरी।
जौई अति प्यारौ पहलौ सौई मुखै दीन्ही।
पूछिहै कह सखी कौन सौ सनेह अति किन्ही।
हसि हैरि सखी बीरी लली मुखै धरीहि।
रसहु रसिक तुम्ह रसिलि सौई पाईहौ।
सौई काज पहिलि बीरी लली हु तै दीन्ही।
तुम्हु भयौ रसै जिनकौई रसिलौ ।
अधर रसै पिबतौ छकत न थकत हौ।
ऐसैहु रसिक की रसिकनि बीरी दीन्ही।
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