कोहबर लीला
कोहबर लीला
कोहबर राम सिय आये री।
बिधि मंगल सब पूरण किन्ही,सखी मिल आसन एक बैठाये री।
परिहास हास सब राम सौ करिहै,लजावै लई सखी दुई चुटकी री।
कोऊ कहे दास राम सिय कौ,कोऊ चुप छबी को निहारे री।
मौन भये मुस्कायै सहज हौ,लाज प्यारी सिय गढी जावै री।
मोहै भी लै चलिहौ जनकपुर,दरस प्यारी छबी कौ पावै री।
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