जब सौं सखी है आयो बसंत

जब सौ सखी हे! आयौ बसंत।
इन रूप छटा कछु ओरई भई,छिन छिन फिरै गुणहु अनंत।
द्रुम मूल लता लट लटकै फिरै,लई मने मति फाग हरंत।
हो हो होरि कह करै जोरी,धरै हाथ ना ज़हां धरंत।
"प्यारी" रस नैनन सरबस बस कर,छाडी धाय ना जानौ तुरंत।

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