ब्रत तीर्थ

ब्रत तीरथ
ब्रत तीरथ कर कितनेई,पिय मिले न आय।
रे मूरख मन फिरत न काहू,हिय दरस लए पाय।
देश बिदेस भतेरो घोमत,नाहि पलहु दए दिखाए।
पलक सो पलक जबहि जोडिए,पिय छबी दिखलाए।
एक दिनन पिय आन मिलेगौ,आस मोहै बिस्वास।
दासी साँवल प्यारी होयी,श्वास श्वास पिय पास।

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