मन के तानपुरै पै सुमिरै,निसदिन रसना राधा राधा।

मन के तानपुरै पै सुमिरै,निसदिन रसना राधा राधा।
सुमिरत ज्यौई बाढत त्यौई,उर अंतर रस प्रेम अगाधा।
भाव देह शुद्ध सिद्ध हौईहै,मेटत मोह रुप जग बाधा।
कुँजनि संग सखिन अनुगत हौ,मिलत टहल रंग युगल प्रसादा।
हित चरणनि धर शीश भजिहै,"प्यारी" श्री राधा श्री राधा।

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