सिया जी दर्पण

सिया जी पदार्पण
सुकुमारी लली बर चली बरनै।
रूप अनूप मधु सौ सुरीति,कर सोहत बरमाल हिय हरनै।
मंद चलत ढुरत द्वौ नैना,पलक उठावत मुख नाय निरखै।
चरण लगावत दैखनौ च्हावत,लाज सौई उठावै ना मुखै।
सखी तबहु जुक्ति ऐसौ किन्ही,छूवत चरण प्यारौ कौ गिरही।
झुकत उठावन ज्यौ ही प्रभौ जी,निरख लई प्यारौ मुख तबही।
दुई परस्पर बरमाल पिरहाये,तरंग रंग उज्जवल सिहरन होहि।
आज दिन शुभ सब आस पूराये,प्यारी आस दरस पूरायौ त्यौही

Comments

Popular posts from this blog

हरि आए संग

कहा प्राणन

तुव बिन पिया