काठ को हांडी

काठ को हांडी
काठ को हांडी देहि री आली।
पुनि पुनि नाय अगन चढिहै,नाहि बैरि स्वाद पकारी।
माँजनो झाडनो कितनोई करिहै,नाय कछु भेद हुआरी।
इक दिना आँच बिषय जल जहिहै,बनिहौ राख कौ ढैरी।
हाथ मलत पाछे कछु ना हुहिहै,काल जबै करत बेचारी।
दाल भात बिषयन को पकायौ,ऐकेहु बार बनारी।
अंत समयै जब जर जहिहैगौ,कोउ ना बचावन हारी।
अजहु समय जल शीतल भरिहै,हाँडी!नाम धन भर लै प्यारी।

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