अब दर्शनः दो

अब!दरशन दो मौहे कुंज-बिहारी।
दरशन दो मौहे कुंज-बिहारी।
नैननि प्यासै प्राणनि प्यासै,मीन मरै ज्यौ जल मधै प्यासै,अचरज अतिही भारी।।
जनम अथक राह तकत,तौसो आवौ जी आवौ पुकार करत,ऐसी काहै बिसारी।।
नैननि ऐसे सागर जैसे,तुम बिनु तुम लौ आवू कैसे,सोचत सोचत हारी।।
अंतिम प्रथम बिनती करन,परी श्वास अटकी मधै जनम मरण,गह बाँह लौ-निकारी।।
अबलौ आए जिन्हु बुलाए,प्यारी बारी च्यौ भाँति भेद बताए,बिगरी काहै म्हारी।।
हठ छाडौ बेगि ठाडौ,निज बूंदी पिय पंकनि सौ काढौ,करियौ निजकी "प्यारी"।।

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