भानु सुता मे उतर मुख धोये।

भानु सुता मे उतर मुख धोये।
अबई जगै उतरिकै सेज सौ,जात उपवन सौ कलिंदी कूल आये।
लटपटै पग गयै यमुना भीतर,छीटै मारि मुख आरस भरै धोये।
धोयकै दोउ आनन जई देखे,पुनि रस प्यास पिय उरमै होये।
बाढि पिय प्यारी उर लिपटाई,गये पिय अधर प्यारी रस खोये।   
रसरानी रस डूबै द्वो रंगीलै,"प्यारी" चहै लिपटै परै जगे सोये।

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