रस सार को उर लागा लौभा।
रस सार को उर लागा लौभा।
छूटे बसन भूषण निरखन का,निरखत कौ हसत दोउ शोभा।
सुरति केलि अनंग रस जोरि,देखि सेज केलि पे करत मौदा।
रति चिन्ह परै पलटि सिंगारि,आलिंगित परै करै रस आलोढा।
विहरत माल डाल गल भुज-की,अटपटै चले बाल दोउ नांदा।
"प्यारी"रैन दिनन लोभ बाढै,पीवू ज्योई त्योई बाढिए ज्यादा।
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