सत्य सत्य यथा
सत्यंऽसत्यं यथार्थात कल्पनाम्।
न ज्ञातुं हृदय: या मस्तिष्क: क्रीडाम्।
उद्गमौ अन्तौ न तुभ्यं विवेचनम्।
जानामि त्वं च त्वं गुण रूपम्।।५।।
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यह आपके प्रति मेरे भाव ये प्रेम,ये सब सच है अथवा झूठ,यह मेरी कल्पनाए अथवा यह सब वास्तविकता है मुझे नही पता।
मै नही जानती की ये सब मेरे मन अथवा मेरे मस्तिष्क का खेल तो नही मेरे संग।
आपके लिए मै कितना भी सोचू,कितनी भी विचार करू मेरे उन विचारो का न तो कोई आदि होता है और न ही अंत,मै सोचती ही जाती हूँ,सोचती ही जाती हूँ।
अत: मेरे प्यारे जु,मै आपकी प्यारी तो केवल और केवल आपको और आपकेगुण(आपके नयन,आपकी मुस्कान,आपके श्रृंगार) आपके रूप को ही जानती हूँ मेरे तो सर्व सर्वस्व आप ही है।
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