भये बोझिल नैन भार निद्रा ते
भए बोझिल नैन भार निंदरा तै।
चटक मटक चटकीलै जौ दोउ,परै शिथिल ढुलकि ढलक कपोल पै।
भले मीन सदृश कीदृश रहे अब,दीखै द्युति रैख ज्यू महीन गगन पै।
गई अधरनि मुस्कनि कछु अलसाई,कछु लकुटी गई जई अधीर ह्यै।।
मुख लेत जम्हात देत चुटकी सखी,संग "प्यारी" करत दरश अबोध से।
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